विलियम जेम्स: उपयोगी होने से कोई बात सत्य हो जाती है?
कोई विश्वास हमें अच्छा महसूस कराता है। क्या इतना ही उसे सत्य साबित कर देता है? विलियम जेम्स का व्यावहारिकतावाद इतनी आसान छूट नहीं देता। विचार को अनुभव में क्या फर्क पड़ता है, वह दूसरे ज्ञान से कैसे जुड़ता है और आगे की जाँच में कितना टिकता है, ये प्रश्न महत्वपूर्ण हैं।

विचार का काम
प्राग्मैटिक पद्धति अमूर्त विवाद में पूछती है कि अलग उत्तर मानने से अनुभव और व्यवहार में क्या अंतर होगा। यदि किसी मत का कोई पहचानने योग्य अंतर नहीं बताया जा सके, तो विवाद का अर्थ फिर से जाँचना चाहिए। यह केवल धन या तात्कालिक लाभ की कसौटी नहीं।
अनुभव की बाधा
जेम्स सत्य की उपयोगिता की चर्चा को लंबे समय और अनुभव के व्यापक क्षेत्र से जोड़ते हैं। नया अनुभव पुराने सूत्र बदलवा सकता है। इसलिए सुविधा के लिए तथ्य छिपाना और विचार का अनुभव में फलदायी होना एक चीज नहीं।
एक काल्पनिक नक्शा
यात्री को नक्शा रास्ता खोजने में मदद करता है। लेकिन बंद पुल का नया प्रमाण मिलने पर नक्शा सुधारना पड़ेगा। काल्पनिक उदाहरण में उपयोगिता वास्तविक रास्तों की बाधा से जुड़ी है; इच्छामात्र से पुल खुल नहीं जाता। यह लेख की उपमा है, जेम्स का शब्दशः प्रसंग नहीं।
सीमा यह है कि व्यावहारिक सफलता और सत्य के संबंध पर विवाद बना रहता है। गलत विश्वास कभी सीमित समय तक उपयोगी दिख सकता है। जेम्स की विस्तृत समझ इस आपत्ति से निपटने का प्रयास है; यह दावा नहीं कि हर पसंदीदा विश्वास प्रमाण से मुक्त है।
क्या जो मेरे काम आए वही सत्य है?
इतनी निजी और तात्कालिक कसौटी उनकी पूरी व्याख्या नहीं। अनुभव, संगति और आगे का परीक्षण भी जरूरी हैं।
क्या विचार बदलना कमजोरी है?
नए अनुभव के सामने संशोधन ज्ञान की जिम्मेदारी हो सकता है। हर परिवर्तन अपने आप प्रगति है, यह भी सिद्ध नहीं।
हिंदी में पुस्तक पढ़ें या सुनें
विलियम जेम्स (William James) — अनुभव, विश्वास और व्यावहारिक सत्य। Deivede Eder Ferreira का स्वतंत्र हिंदी परिचय, ABRAFP International Press। 60 मिनट में महान विचारक श्रृंखला, खंड 49। यह विचारक की अपनी रचना या अधिकृत अनुवाद नहीं है।
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