कितारो निशिदा: शुद्ध अनुभव में शुद्ध का अर्थ क्या है?
संगीत में पूरी तरह डूबे क्षण में क्या हम पहले स्वयं को श्रोता और ध्वनि को अलग वस्तु घोषित करते हैं? कितारो निशिदा का शुद्ध अनुभव इस विभाजन से पहले की अनुभूति को सोचने का प्रयास है। शुद्ध यहाँ नैतिक पवित्रता का नाम नहीं।

अनुभव से विभाजन तक
एन इनक्वायरी इन्टू द गुड में शुद्ध अनुभव प्रारंभिक केंद्रीय अवधारणा है। उसका परिचय यह पूछकर दिया जा सकता है कि जानने वाला और जानी गई वस्तु का भेद अनुभव की संरचना में कैसे उभरता है। हर अनुभव को पहले से अलग स्वयं और बाहरी वस्तु के मिलन की तरह मान लेना अनिवार्य नहीं।
यह अनुभव को बिना सोचे महिमामंडित करना नहीं। बाद में हम उसका वर्णन करते हैं, संबंध बनाते हैं और तर्क की परीक्षा लेते हैं। निशिदा का प्रश्न उस प्रक्रिया की दार्शनिक शुरुआत पर है, न रोजमर्रा की हर अनुभूति को अचूक सत्य घोषित करने पर।
तल्लीनता की काल्पनिक तुलना
एक कुशल वादक धुन बजाते समय हर उँगली को अलग आदेश नहीं देता। यह क्रिया और अनुभव की एकता का संकेत दे सकती है। फिर भी ऐसी तल्लीनता को निशिदा की पूरी अवधारणा का प्रमाण नहीं मानना चाहिए; उदाहरण केवल प्रवेश में मदद करता है।
सीमा यह है कि विषय-वस्तु के विभाजन को पार करने की भाषा अस्पष्ट भी हो सकती है। उसका ठीक दार्शनिक अर्थ पूछना जरूरी है। निशिदा के लंबे बौद्धिक विकास को उनकी शुरुआती पुस्तक के एक शब्द में समेटना भी उचित नहीं।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
क्या शुद्ध अनुभव का अर्थ खाली मन है?
इसे केवल विचारों के अभाव या किसी अभ्यास की सफलता का नाम न मानें; प्रश्न अनुभव की संरचना का है।
क्या यह वैज्ञानिक रूप से सिद्ध अवस्था है?
यहाँ दार्शनिक अवधारणा का परिचय है, किसी मापी हुई मानसिक अवस्था का सार्वभौमिक दावा नहीं।
हिंदी में पुस्तक पढ़ें या सुनें
कितारो निशिदा (Kitarō Nishida) — शुद्ध अनुभव, स्थान और निरपेक्ष शून्यता। Deivede Eder Ferreira का स्वतंत्र हिंदी परिचय, ABRAFP International Press। 60 मिनट में महान विचारक श्रृंखला, खंड 191। यह विचारक की अपनी रचना या अधिकृत अनुवाद नहीं है।
ई-बुक और ऑडियोबुक अलग संस्करण हैं। वर्तमान कीमत, नमूना और आपके देश की उपलब्धता Google Play पर देखें।
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