शोपेनहावर: इच्छा पूरी होने पर भी संतोष क्यों नहीं टिकता?
शोपेनहावर के दर्शन में चाह का पूरा होना इच्छा की प्रक्रिया को स्थायी रूप से समाप्त नहीं करता। कोई कमी मिटती है, फिर नई चाह या ऊब सामने आ सकती है। यह केवल खरीदारी की आदत पर टिप्पणी नहीं, उनके संसार, शरीर और मूल इच्छा से जुड़े व्यापक दार्शनिक ढाँचे का हिस्सा है।

किसी लक्ष्य का मिलना सुखद हो सकता है। प्रश्न यह है कि हम उससे किस तरह के स्थायी संतोष की अपेक्षा कर रहे थे। अपेक्षा और अनुभव में अंतर होने पर तुरंत यह निष्कर्ष निकालना भी ठीक नहीं कि उपलब्धि निरर्थक थी या जीवन में आनंद संभव नहीं।
‘इच्छा’ केवल सचेत फैसला नहीं
The World as Will and Idea में शोपेनहावर शरीर और इच्छा के संबंध से आगे संसार की व्याख्या करते हैं। उनका ‘विल’ किसी व्यक्ति की एक क्षणिक पसंद से व्यापक तत्त्वमीमांसक धारणा है। उसी पुस्तक में पीड़ा और ऊब का चक्र तथा कला में चाह से अस्थायी विराम की चर्चा मिलती है।
The Basis of Morality में वे करुणा को नैतिक प्रेरणा में महत्वपूर्ण स्थान देते हैं। इन ग्रंथों को साथ पढ़ने से स्पष्ट होता है कि उनके दर्शन को केवल निराशा के एक नारे में नहीं समेटना चाहिए। यह उनके तर्क का परिचय है, मनोवैज्ञानिक शोध से सिद्ध सार्वभौमिक नियम नहीं।
एक काल्पनिक दृश्य: अगली उपलब्धि की प्रतीक्षा
कल्पना करें कि विवेक लंबे समय से एक नया उपकरण खरीदना चाहता है। खरीदने के बाद कुछ दिन उसे खुशी होती है। फिर वह अधिक महँगे मॉडल की तुलना करने लगता है। यह इस लेख का बनाया हुआ उदाहरण है, शोपेनहावर की अपनी मिसाल नहीं।
यहाँ कई प्रश्न पूछे जा सकते हैं। क्या पुराने उपकरण में वास्तव में कोई कमी थी? क्या नई खरीद काम में मदद कर रही है? क्या तुलना प्रतिष्ठा से जुड़ी है? यदि हर बार नई वस्तु से अंतिम संतोष की उम्मीद रखी जाए तो तुलना का सिलसिला चलता रह सकता है। फिर भी एक घटना से किसी व्यक्ति के संपूर्ण जीवन या मानसिक स्थिति का निष्कर्ष नहीं निकलता।
कला को केवल उपयोगी उत्पाद क्यों न मानें?
किसी चित्र को देखते हुए अगर हमारा ध्यान केवल उसके दाम या अपने कमरे में उसके प्रभाव पर रहे, तो अनुभव एक खास उपयोग से बँधा रहता है। उसी चित्र के रंग, रूप और बनावट पर ठहरना दूसरी तरह का ध्यान है। यह समकालीन तुलना शोपेनहावर की सौंदर्य-चर्चा तक पहुँचने का एक सीमित रास्ता है।
कला को इस अर्थ में पढ़ना मनोरंजन या लाभ की सारी भूमिकाएँ नकारना नहीं है। न ही इससे यह दावा बनता है कि संगीत सुनना हर दुःख का उपचार है। दार्शनिक अनुभव का वर्णन और स्वास्थ्य पर किसी गतिविधि का प्रभाव अलग प्रकार के प्रश्न हैं।
करुणा चर्चा में क्यों आती है?
अपनी चाह पर बहुत ध्यान होने पर दूसरे व्यक्ति की जरूरत पीछे जा सकती है। करुणा की चर्चा हमें यह प्रश्न देती है कि दूसरे का कष्ट हमारे व्यवहार में किस तरह महत्व पाए। इसे केवल अपनी शांति के साधन की तरह देखने पर दूसरे व्यक्ति का महत्व फिर छोटा हो जाएगा।
पाठ पढ़ते समय यह नोट करें कि कोई इच्छा किस जरूरत से जुड़ी है, उसकी पूर्ति से क्या बदला और किस व्यक्ति का अनुभव चर्चा से बाहर रह गया। यह अध्ययन के प्रश्न हैं, इच्छाएँ समाप्त करने की निश्चित विधि नहीं।
हिंदी में एक व्यापक परिचय
नीचे दिया गया खंड इच्छा को ज्ञान, शरीर, कला और करुणा के साथ रखता है। यह मूल ग्रंथ का अधिकृत अनुवाद नहीं, स्वतंत्र हिंदी विवेचन है। परिचय के बाद मूल पुस्तक की चुनी खंडिकाएँ पढ़ें और देखें कि हमारी रोजमर्रा की तुलना कहाँ उपयोगी है तथा कहाँ दार्शनिक तर्क उससे आगे चला जाता है।
हिंदी में पुस्तक पढ़ें या सुनें
आर्थर शोपेनहावर (Arthur Schopenhauer) — इच्छा, दुःख, कला और करुणा। Deivede Eder Ferreira का स्वतंत्र हिंदी परिचय, ABRAFP International Press। 60 मिनट में महान विचारक श्रृंखला, खंड 10। यह विचारक की अपनी रचना या अधिकृत अनुवाद नहीं है।
ई-बुक और ऑडियोबुक अलग संस्करण हैं। वर्तमान कीमत, नमूना और आपके देश की उपलब्धता Google Play पर देखें।
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