मार्क्यूज़: समृद्ध समाज में आलोचना क्यों सिकुड़ती है?
सुविधाएँ बढ़ने से समाज पर प्रश्न करने की क्षमता अपने आप क्यों नहीं बढ़ती? हर्बर्ट मार्क्यूज़ का एक-आयामी समाज इस संभावना को जाँचता है कि संतोष और समावेशन के भीतर ही वैकल्पिक जीवन की कल्पना कमजोर हो जाए।

जरूरतें भी बनती हैं
वन-डायमेंशनल मैन में जरूरतों को केवल निजी, स्वतः उत्पन्न इच्छाएँ नहीं माना जाता। विज्ञापन, काम और संस्थाएँ उन्हें आकार देते हैं। कुछ जरूरतें ऐसा जीवन बनाए रखने से जुड़ सकती हैं जो स्वतंत्रता का दायरा घटाता है।
तकनीकी दक्षता भी राजनीतिक प्रश्न से अलग नहीं रहती। कौन-सा लक्ष्य स्वाभाविक माना गया है और किन विकल्पों को अव्यावहारिक कह दिया गया, यह देखना जरूरी है। आलोचना के शब्द ही व्यवस्था की मौजूदा सीमाओं में समा सकते हैं।
समय बचाने का काल्पनिक वादा
काल्पनिक संस्था नया उपकरण देकर समय बचाती है, फिर बचा समय अधिक काम से भर देती है। सुविधा वास्तविक है, लेकिन अधिक स्वतंत्र समय नहीं मिलता। प्रश्न उपकरण की गति से आगे जीवन के लक्ष्य पर जाता है।
दूसरों की जरूरत कौन तय करे?
सच्ची और झूठी जरूरतों का भेद संरक्षणवादी हो सकता है: कौन दूसरों के लिए निर्णय करेगा? मार्क्यूज़ की चुनौती को पढ़ते समय यह आपत्ति जरूरी है। हर उपभोक्ता की पसंद को भ्रम बताना तर्क और सामाजिक प्रमाण की जगह नहीं ले सकता।
क्या मार्क्यूज़ हर तकनीक के विरोधी हैं?
मुख्य प्रश्न तकनीक के सामाजिक संगठन, लक्ष्य और उससे जुड़े प्रभुत्व का है।
क्या सुविधा स्वतंत्रता के बराबर है?
सुविधा मूल्यवान हो सकती है, लेकिन अपने जीवन के लक्ष्य चुनने का प्रश्न अलग रहता है।
हिंदी में पुस्तक पढ़ें या सुनें
हर्बर्ट मार्क्यूज़ (Herbert Marcuse) — मुक्ति, तकनीक और एक-आयामी समाज। Deivede Eder Ferreira का स्वतंत्र हिंदी परिचय, ABRAFP International Press। 60 मिनट में महान विचारक श्रृंखला, खंड 108। यह विचारक की अपनी रचना या अधिकृत अनुवाद नहीं है।
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