ह्यूम: कल भी वैसा होगा, यह हम कैसे जानते हैं?
हर सुबह बस समय पर आई है। क्या इससे कल भी उसका समय पर आना तर्क की पूर्ण निश्चितता बन जाता है? ह्यूम अनुभव की उपयोगिता नकारते नहीं; वे पूछते हैं कि अतीत से भविष्य की ओर हमारी छलाँग किस आधार पर होती है।

अनुभव क्या देता है?
हम घटनाओं का बार-बार साथ होना देखते हैं। उससे एक के बाद दूसरे की अपेक्षा बनती है। लेकिन जो अभी नहीं हुआ, उसके बारे में निष्कर्ष केवल पिछली घटनाओं की सूची में सीधे मौजूद नहीं है। यही आगमन संबंधी कठिनाई का आरंभ है।
चक्र कहाँ बनता है?
यदि कहें कि भविष्य अतीत जैसा होगा क्योंकि अब तक ऐसा हुआ है, तो फिर अतीत के आधार पर भविष्य का अनुमान ही उपयोग हो रहा है। ह्यूम इसे अनुभव की समानता का स्वतंत्र प्रमाण नहीं मानते। आदत बताती है कि अपेक्षा कैसे बनती है; वह गणित जैसा अनिवार्य प्रमाण नहीं।
सावधान अनुमान
काल्पनिक दुकानदार निखिल पिछले महीनों की बिक्री देखकर अगला माल मँगाता है। उसे अनुमान की जरूरत है, पर त्योहार, रास्ता बंद होने या नया प्रतिस्पर्धी आने से परिणाम बदल सकता है। यह संपादकीय उदाहरण ह्यूम की समस्या को व्यावहारिक पूर्वानुमान से जोड़ता है।
सीमा स्पष्ट रहे: इस प्रश्न से सभी अनुमान बराबर अच्छे नहीं हो जाते। अधिक और बेहतर प्रमाण फिर भी फर्क डाल सकते हैं। ह्यूम का दार्शनिक संशय प्रयोग, निरीक्षण और संभाव्यता की व्यावहारिक भूमिका समाप्त करने का सरल आदेश नहीं है।
क्या ह्यूम कहते हैं कि कोई कारण होता ही नहीं?
उनकी चर्चा हमारे कारण-ज्ञान और आवश्यक संबंध की धारणा पर है। उसे एक वाक्य में सार्वभौमिक निषेध कहना भ्रामक है।
क्या भविष्य के बारे में सोचना छोड़ देना चाहिए?
नहीं। अपेक्षा मानवीय जीवन का हिस्सा है; मुख्य बात उसके आधार और उसकी निश्चितता की सीमा पहचानना है।
हिंदी में पुस्तक पढ़ें या सुनें
डेविड ह्यूम (David Hume) — अनुभव, संशय और मानवीय स्वभाव। Deivede Eder Ferreira का स्वतंत्र हिंदी परिचय, ABRAFP International Press। 60 मिनट में महान विचारक श्रृंखला, खंड 36। यह विचारक की अपनी रचना या अधिकृत अनुवाद नहीं है।
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