गांधी का स्वराज: शासन बदलने से आगे का प्रश्न
विदेशी शासक चला जाए और उसी तरह का दमन स्थानीय शासक करने लगे, तो क्या स्वतंत्रता पूरी हो गई? गांधी का स्वराज इस कठिन प्रश्न से जुड़ता है। हिंद स्वराज में राजनीतिक सत्ता का परिवर्तन जरूरी प्रश्न है, लेकिन अपने जीवन और साधनों की जिम्मेदारी भी सामने आती है।

अपने ऊपर शासन
गांधी स्वराज को आत्मनियंत्रण से जोड़ते हैं। इसका आशय केवल निजी आदतें सुधारना नहीं; यह देखना भी है कि डर, लालच और निर्भरता हमारी सार्वजनिक कार्रवाई को कैसे दिशा देते हैं। नागरिक स्वतंत्रता और आत्मशासन को वे संबंधित मानते हैं।
साधन लक्ष्य में पहुँचते हैं
हिंद स्वराज में अन्याय के विरोध का साधन स्वयं नैतिक विचार का विषय है। यदि स्वतंत्रता के नाम पर दमन को सामान्य बना दिया जाए, तो नया शासन पुरानी समस्या लौटा सकता है। इस कारण अहिंसक प्रतिरोध उनके लिए केवल कमजोर पक्ष की सुविधाजनक चाल नहीं है।
रोजमर्रा की एक उपमा
एक काल्पनिक सहकारी समूह पुराने अध्यक्ष की मनमानी का विरोध करता है। नई समिति बनते ही वही लोग हिसाब छिपाने लगते हैं। गांधी से प्रेरित संपादकीय प्रश्न होगा: बदलाव केवल पदधारी का हुआ या निर्णय की पद्धति का भी? यह किसी ऐतिहासिक आश्रम का विवरण नहीं।
सीमा स्पष्ट रहे: हिंद स्वराज की आधुनिक सभ्यता, मशीनों और पेशों संबंधी तीखी आलोचना पर व्यापक असहमति है। आत्मशासन को संस्थागत अन्याय का भार अकेले पीड़ित पर डालने के लिए इस्तेमाल नहीं किया जाना चाहिए। गांधी के अपने बदलते मतों और उनके आलोचकों को भी साथ पढ़ना जरूरी है।
क्या स्वराज का अर्थ केवल निजी अनुशासन है?
नहीं। उसमें राजनीतिक स्वतंत्रता और साझा जीवन का प्रश्न भी है; निजी और सार्वजनिक पक्ष जुड़े हैं।
क्या अहिंसा अन्याय सहना है?
गांधी का प्रतिरोध अन्याय को चुनौती देता है। उसके साधनों पर संयम निष्क्रिय स्वीकार का पर्याय नहीं।
हिंदी में पुस्तक पढ़ें या सुनें
महात्मा गांधी (Mahatma Gandhi) — सत्य, अहिंसा और स्वराज का प्रयोग। Deivede Eder Ferreira का स्वतंत्र हिंदी परिचय, ABRAFP International Press। 60 मिनट में महान विचारक श्रृंखला, खंड 31। यह विचारक की अपनी रचना या अधिकृत अनुवाद नहीं है।
ई-बुक और ऑडियोबुक अलग संस्करण हैं। वर्तमान कीमत, नमूना और आपके देश की उपलब्धता Google Play पर देखें।
स्रोत और आगे की पढ़ाई










टिप्पणियां