दोगेन: साधना और जागृति को अलग क्यों न करें?
पहले अभ्यास करेंगे, फिर एक दिन लक्ष्य पा लेंगे: सीखने की यह तस्वीर परिचित है। दोगेन की ज़ेन परंपरा पूछती है कि साधना को केवल भविष्य के पुरस्कार का साधन मानने पर वर्तमान अभ्यास का क्या अर्थ रह जाता है।

अभ्यास में ही साक्षात्कार
दोगेन के बेंदोवा में साधना और जागृति की अविभाज्यता महत्वपूर्ण है। ज़ाज़ेन को केवल ऐसी तकनीक मानना पर्याप्त नहीं जिससे बाद में कोई अलग उपलब्धि मिले। अभ्यास का निर्वाह ही बौद्ध मार्ग को वास्तविक रूप देता है।
इससे अनुशासन का महत्व समाप्त नहीं होता। न ही यह दावा है कि कोई भी व्यवहार अपने आप जागृति है। रूप, अभ्यास और शिक्षक-परंपरा इस धार्मिक संदर्भ के अंग हैं; शब्द को केवल प्रेरक नारा नहीं बनाना चाहिए।
लक्ष्य का काल्पनिक दृश्य
काल्पनिक विद्यार्थी बैठने के हर मिनट को उपलब्धि के अंक में बदलता है। वह लगातार जाँचता है कि विशेष अनुभव कब मिलेगा। दोगेन की दिशा में प्रश्न होगा कि यह लक्ष्य-लालसा वर्तमान साधना के संबंध को कैसे बदल रही है।
समय और आधुनिक दावे
उजी, अर्थात अस्तित्व-समय, भी साधारण घड़ी के समय से गहरा प्रश्न उठाता है। उसे आधुनिक भौतिकी की खोज या मानसिक स्वास्थ्य के सिद्ध उपचार के रूप में पेश करना गलत होगा। यह विशिष्ट बौद्ध दार्शनिक और साधना-संबंधी भाषा है।
क्या लक्ष्य न रखने का मतलब प्रयास छोड़ना है?
नहीं। साधना के गंभीर निर्वाह को अलग भविष्य के पुरस्कार से नहीं बाँधा जाता।
क्या यह तुरंत जागृति की गारंटी है?
नहीं। ऐसा प्रचार दोगेन के जटिल धार्मिक विचार को सरल दावा बना देगा।
हिंदी में पुस्तक पढ़ें या सुनें
दोगेन (Dogen) — साधना, जागृति और अस्तित्व-समय। Deivede Eder Ferreira का स्वतंत्र हिंदी परिचय, ABRAFP International Press। 60 मिनट में महान विचारक श्रृंखला, खंड 138। यह विचारक की अपनी रचना या अधिकृत अनुवाद नहीं है।
ई-बुक और ऑडियोबुक अलग संस्करण हैं। वर्तमान कीमत, नमूना और आपके देश की उपलब्धता Google Play पर देखें।
स्रोत और आगे की पढ़ाई










टिप्पणियां