बर्कले: क्या अनुभूति का संसार केवल कल्पना है?
मेज दिखाई और महसूस होती है। बर्कले पूछते हैं कि इन अनुभूत गुणों के पीछे एक बिल्कुल अननुभूत भौतिक आधार मानने से हम क्या जोड़ते हैं। उनका आदर्शवाद मेज को मनमानी कल्पना बताने का सरल दावा नहीं; दर्शन में पदार्थ की एक खास अवधारणा की आलोचना है।

विचार और ग्रहण करने वाला
बर्कले रंग, स्वाद और स्पर्श जैसे अनुभव-विषयों को विचार कहते हैं। साथ ही मन या आत्मा वह सक्रिय कर्ता है जो ग्रहण करता है और इच्छा करता है। इसलिए सब कुछ एक ही प्रकार का विचार है कहना उनके भेद को खो देता है।
अनुभव इच्छा पर नहीं चलता
कल्पना में हम दृश्य बदल सकते हैं, लेकिन आँख खुलने पर हर रंग अपनी इच्छा से नहीं चुनते। बर्कले इंद्रिय अनुभव की नियमितता और व्यवस्थितता को कल्पना से अलग रखते हैं। उनकी प्रणाली में इसके लिए दिव्य मन का महत्वपूर्ण स्थान है।
एक काल्पनिक कमरा
काल्पनिक पाठक कमरे से बाहर जाता है और कहता है कि क्या अब मेज मिट गई। प्रश्न का उत्तर केवल उसकी निजी दृष्टि तक सीमित नहीं; बर्कले दूसरे मनों और ईश्वर को भी मानते हैं। यह संपादकीय दृश्य लोकप्रिय गलतफहमी दिखाता है, उनके सभी तर्कों का प्रमाण नहीं।
सीमा स्पष्ट है: अनुभव की निर्भरता से मन से स्वतंत्र पदार्थ का निषेध कैसे निकले, इस पर बहस है। नियमित संसार के लिए ईश्वर का आधार देना भी अलग दार्शनिक प्रतिबद्धता है। इस मत को आधुनिक भौतिकी ने सिद्ध किया, ऐसा कहना अनुचित होगा।
क्या बर्कले कहते हैं कि केवल मेरा मन है?
नहीं। वे अन्य आत्माओं और ईश्वर को स्वीकारते हैं। उनका मत सरल एकल-मनवाद नहीं।
क्या असली वस्तु और कल्पना में फर्क बचता है?
हाँ। वे इंद्रिय अनुभव की स्थिरता, व्यवस्था और इच्छा से स्वतंत्रता पर जोर देते हैं।
हिंदी में पुस्तक पढ़ें या सुनें
जॉर्ज बर्कले (George Berkeley) — अनुभूति, विचार और पदार्थ की आलोचना। Deivede Eder Ferreira का स्वतंत्र हिंदी परिचय, ABRAFP International Press। 60 मिनट में महान विचारक श्रृंखला, खंड 67। यह विचारक की अपनी रचना या अधिकृत अनुवाद नहीं है।
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