
हिंदी में महान विचारकों की विशाल पुस्तक-श्रृंखला: भारत, दर्शन और मनोविश्लेषण के बीच एक बौद्धिक सेतु
जब कोई पुस्तक-श्रृंखला एक बौद्धिक सेतु बन जाती है
कुछ संपादकीय परियोजनाएँ केवल सूची में नई किताबें जोड़ती हैं। कुछ दूसरी परियोजनाएँ भाषाओं, संस्कृतियों और विचार-पद्धतियों के बीच रास्ता बनाती हैं। 60 मिनट में महान विचारक इसी दूसरी आकांक्षा से जन्मी श्रृंखला है। इसका उद्देश्य हिंदी पाठक को दर्शन, मनोविश्लेषण और उन मूल प्रश्नों की व्यवस्थित यात्रा देना है जो मानव अनुभव को सदियों से आकार देते आए हैं। Deivede Eder Ferreira द्वारा लिखित और ABRAFP International Press द्वारा प्रकाशित यह परियोजना दर्जनों पुस्तकों वाली एक विशाल श्रृंखला के रूप में तैयार की गई है, जिन्हें Google Play Books पर ई-बुक और ऑडियोबुक के रूप में चरणबद्ध ढंग से प्रस्तुत किया जा रहा है।
इस प्रस्ताव का महत्व केवल खंडों की संख्या में नहीं है। एक ही संपादकीय पद्धति के भीतर भारतीय और पाश्चात्य चिंतक, आध्यात्मिक शिक्षक और आलोचनात्मक दार्शनिक, प्राचीन परंपराएँ और आधुनिक मनोविश्लेषण एक साथ आते हैं। विवेकानंद को नीत्शे के निकट पढ़ा जा सकता है; पतंजलि के बाद फ्रायड की ओर बढ़ा जा सकता है; बुद्ध और नागार्जुन के प्रश्न सुकरात तथा कांट के प्रश्नों से संवाद कर सकते हैं; गांधी, आंबेडकर, मार्क्स, सिमोन द बोउवार और हन्ना आरेंट स्वतंत्रता, न्याय, सत्ता और उत्तरदायित्व पर अलग-अलग दृष्टियाँ सामने रखते हैं।
यही संरचना पुस्तकों की एक सूची को अध्ययन के मानचित्र में बदलती है। जिज्ञासु पाठक को प्रवेश-द्वार मिलता है। दर्शन का विद्यार्थी परंपराओं, पद्धतियों और शब्दावलियों के अंतर को पहचान सकता है। मनोविश्लेषण में रुचि रखने वाला व्यक्ति देख सकता है कि इच्छा, पीड़ा, चेतना, संघर्ष और आत्म की अवधारणाएँ समय और संस्कृति बदलने पर किस प्रकार नए अर्थ ग्रहण करती हैं। इस प्रकार श्रृंखला एक परिचयात्मक पुस्तकालय बनती है जिसमें ऐतिहासिक विस्तार, संपादकीय एकता और अंतरराष्ट्रीय संवाद की स्पष्ट आकांक्षा है।
“60 मिनट में महान विचारक” का वास्तविक अर्थ
श्रृंखला का नाम यह दावा नहीं करता कि किसी महान विचारक को ठीक एक घंटे में पूरी तरह समझ लिया जा सकता है। गंभीर चिंतन को घड़ी की सीमा में बंद नहीं किया जा सकता। “60 मिनट” यहाँ सुगमता का संपादकीय वचन है: प्रत्येक खंड पाठक को विचारक के जीवन-संदर्भ, मुख्य अवधारणाओं, आंतरिक तनावों, प्रमुख आलोचनाओं और आज की प्रासंगिकता का स्पष्ट तथा संगठित परिचय देता है। यह इतना विस्तृत है कि पहली समझ ठोस बने और इतना संक्षिप्त कि काम, अध्ययन तथा दैनिक जिम्मेदारियों के बीच भी पढ़ा या सुना जा सके।
यह चुनाव हमारे समय की एक वास्तविक समस्या का उत्तर देता है। आज जानकारी की कमी नहीं है, लेकिन जानकारी दिशा के समान नहीं होती। छोटे वीडियो, संदर्भ से काटी गई पंक्तियाँ और आकर्षक उद्धरण परिचय का भ्रम पैदा कर सकते हैं, जबकि समझ विकसित नहीं होती। एक अच्छी परिचयात्मक पुस्तक उलटा काम करती है: वह चयन करती है पर विचार को विकृत नहीं करती, भाषा सरल करती है पर विषय को तुच्छ नहीं बनाती, और क्रम देती है पर मतभेदों को छिपाती नहीं।
इसलिए हर खंड आगे पढ़ने का निमंत्रण है। पाठक फ्रायड की मूल अवधारणाओं से परिचित होकर उनकी विस्तृत रचनाओं की ओर जा सकता है; शंकराचार्य और अद्वैत वेदांत का स्थान समझकर गंभीर भाष्यों की खोज कर सकता है; सिमोन द बोउवार के माध्यम से स्वतंत्रता, परिस्थिति और स्त्री-अनुभव पर होने वाली बहसों को पहचान सकता है; कबीर की कविता में धार्मिक तथा सामाजिक सीमाओं को चुनौती देने वाली आवाज़ सुन सकता है। सार्थक परिचय विचार का अंत नहीं करता। वह स्वतंत्र अध्ययन की शुरुआत संभव बनाता है।
एक विशाल संग्रह की वैचारिक संरचना
पहला बड़ा आयाम भारतीय चिंतन की बहुलता को सामने लाता है। स्वामी विवेकानंद, जिद्दू कृष्णमूर्ति, ओशो, रमण महर्षि और श्री अरविंद चेतना, स्वतंत्रता, आत्म-परिवर्तन और आध्यात्मिक जीवन को एक ही प्रकार से नहीं समझते। बुद्ध, शंकराचार्य, पतंजलि और नागार्जुन पीड़ा, ज्ञान, साधना, शून्यता, पहचान तथा मुक्ति पर भिन्न दार्शनिक रास्ते खोलते हैं। कबीर, महावीर, गुरु नानक और रामकृष्ण परमहंस इस परिदृश्य को उन स्वरूपों से विस्तृत करते हैं जिन्हें किसी एक सिद्धांत या धार्मिक लेबल में सीमित नहीं किया जा सकता।
दूसरा आयाम प्राचीन नैतिकता और यूनानी दर्शन से जुड़ा है। सुकरात, प्लेटो और अरस्तू सत्य, सद्गुण, राजनीति, ज्ञान और मनुष्य की शिक्षा पर आधारभूत प्रश्न उठाते हैं। मार्कस ऑरेलियस, सेनेका और एपिक्टेटस यह समझने में सहायता करते हैं कि स्टोइक दर्शन आज फिर इतना आकर्षक क्यों हुआ है। साथ ही, श्रृंखला प्राचीन स्टोइक अनुशासन और सोशल मीडिया पर प्रचलित त्वरित प्रेरक संस्करणों के बीच अंतर बनाए रखती है।
तीसरा आयाम आधुनिक दर्शन के निर्माण और उसके संकटों का अनुसरण करता है। डेसकार्ट, स्पिनोज़ा, ह्यूम और कांट बुद्धि, अनुभव, स्वतंत्रता, पदार्थ और ज्ञान की सीमाओं पर विचार करते हैं। शोपेनहावर, कीर्केगार्द और नीत्शे इच्छा, चिंता, अस्तित्व, मूल्य तथा संस्कृति की आलोचना को केंद्र में लाते हैं। अल्बेर कामू निरर्थकता की समस्या से टकराते हुए पूछते हैं कि ऐसी दुनिया में कैसे जिया जाए जो हमारे लिए पहले से तैयार अंतिम उत्तर नहीं देती।
चौथा आयाम राजनीति और सामाजिक परिवर्तन से संबंधित है। चाणक्य, गांधी, आंबेडकर, मार्क्स, जॉन स्टुअर्ट मिल, सिमोन द बोउवार और हन्ना आरेंट रणनीति, सत्ता, न्याय, उपयोगिता, मुक्ति, उत्पीड़न, लोकतंत्र तथा सार्वजनिक उत्तरदायित्व की तुलना संभव बनाते हैं। रवीन्द्रनाथ ठाकुर, सर्वपल्ली राधाकृष्णन, दयानंद सरस्वती और नारायण गुरु दिखाते हैं कि शिक्षा, सुधार, धर्म, सामाजिक पहचान और मानवतावाद आधुनिक भारत की रचना में कितने निर्णायक रहे हैं।
फ्रायड और युंग आधुनिक मानसिक जीवन को समझने के दो अनिवार्य संदर्भ प्रस्तुत करते हैं। उनसे संबंधित खंड अचेतन, स्वप्न, लक्षण, कामना, संघर्ष, प्रतीक और व्यक्तित्वीकरण जैसी अवधारणाओं को त्वरित सलाह में बदलने से बचते हैं। वे श्रृंखला की एक केंद्रीय समस्या भी स्पष्ट करते हैं: जब कोई सिद्धांत एक विशेष यूरोपीय ऐतिहासिक संदर्भ में जन्म लेता है और फिर हिंदी भाषा, भारतीय अनुभव तथा अन्य आत्म-बोधों के बीच पहुँचता है, तो उसके अर्थ में क्या बदलता है?
दर्शन और मनोविश्लेषण को हिंदी में प्रकाशित करना क्यों आवश्यक है
हिंदी विश्व की सबसे व्यापक भाषाओं में से एक है और एक ऐसे सांस्कृतिक क्षेत्र का हिस्सा है जहाँ भाषाई, धार्मिक, दार्शनिक तथा सामाजिक विविधता अत्यंत गहरी है। हिंदी में प्रकाशित करना केवल शब्दों का अनुवाद करना नहीं है। यह स्वीकार करना है कि ज्ञान को उन संपादकीय केंद्रों से बाहर भी स्वतंत्र रूप से चलना चाहिए जिन्होंने लंबे समय तक अंतरराष्ट्रीय अकादमिक उत्पादन और वितरण को नियंत्रित किया।
आधुनिक दर्शन और मनोविश्लेषण का वैश्विक प्रसार प्रायः कुछ प्रतिष्ठित भाषाओं पर निर्भर रहा है। इसके कारण अनेक भाषाई समुदायों तक महत्त्वपूर्ण रचनाएँ देर से, आंशिक रूप में या अत्यधिक तकनीकी भाषा में पहुँचीं। हिंदी में एक सुव्यवस्थित परिचयात्मक संग्रह विकसित करके ABRAFP International Press उस व्यापक प्रयास में भाग लेता है जो अवधारणात्मक सावधानी बनाए रखते हुए ज्ञान की पहुँच बढ़ाना चाहता है।
यह परियोजना भारत को केवल बाहर से आए विचारों के उपभोक्ता के रूप में भी प्रस्तुत नहीं करती। भारतीय चिंतकों की मजबूत उपस्थिति संवाद को दोतरफा बनाती है। यहाँ भारतीय परंपरा किसी पाश्चात्य सूची की सजावट या रहस्यमय आकर्षण नहीं है। वह स्वयं प्रश्नों, मतभेदों, तर्कों और ऐतिहासिक संघर्षों का विशाल क्षेत्र है। चेतना, पीड़ा, कामना, अनुशासन, स्वतंत्रता तथा यथार्थ के विषय अनेक रास्तों से सोचे गए हैं; पाठक उन रास्तों की तुलना कर सकता है, बिना उनके वास्तविक अंतर मिटाए।
इसी आधार पर इस श्रृंखला को जिम्मेदारी के साथ हिंदी में समकालीन दार्शनिक परिचय की सबसे व्यापक और व्यवस्थित एकल-लेखकीय पहलों में से एक कहा जा सकता है। किसी संपूर्ण, वैश्विक और सत्यापन योग्य ग्रंथ-सूची सर्वेक्षण के बिना इसे निश्चित रूप से “दुनिया की सबसे बड़ी श्रृंखला” कहना उचित नहीं होगा। इसकी प्रमाणित विशिष्टता दर्जनों पुस्तकों की सुव्यवस्थित योजना, भारतीय और पाश्चात्य परंपराओं के संयोजन, मनोविश्लेषण की उपस्थिति और एक ही संपादकीय पहचान के भीतर पाठ तथा श्रव्य दोनों प्रारूपों में है।

पढ़ना और सुनना: एक ही मुलाकात के दो रास्ते
ई-बुक पाठक को अंश चिह्नित करने, अवधारणाएँ खोजने, टिप्पणियाँ लिखने और कठिन भागों पर लौटने की सुविधा देती है। ऑडियोबुक उन लोगों के लिए रास्ता खोलती है जो सुनकर बेहतर सीखते हैं या यात्रा, पैदल चलने और दैनिक अंतरालों में अध्ययन को शामिल करना चाहते हैं। जब दोनों प्रारूप एक ही संरचना साझा करते हैं, तो अध्ययन अधिक लचीला बनता है: कोई व्यक्ति सुनकर शुरुआत कर सकता है, पढ़कर गहराई में जा सकता है और आवश्यकता के अनुसार किसी अध्याय को दूसरे माध्यम में फिर से देख सकता है।
इस दोहरे प्रारूप का सांस्कृतिक अर्थ भी है। दर्शन का बड़ा भाग जीवित वाणी से विकसित हुआ—संवाद, व्याख्यान, शिष्य-परंपरा, टिप्पणी, कथा और मौखिक स्मृति से। ऑडियोबुक मौन पठन का स्थान लिए बिना उस श्रव्य आयाम का एक हिस्सा वापस लाती है। आवाज़ गति देती है, प्रश्नों पर बल देती है और विचार को चलते शरीर के साथ रहने देती है। लिखित पाठ दूसरी शक्ति देता है: रुकने, तुलना करने, संशय दर्ज करने और किसी शब्द पर लंबे समय तक ठहरने की स्वतंत्रता।
श्रृंखला का प्रकाशन चरणों में किया जा रहा है। Google Play Books पर आधिकारिक पृष्ठ उन खंडों को दिखाता है जिनका संपादकीय तथा तकनीकी प्रसंस्करण पूरा हो चुका है और नए संस्करण तैयार होते ही उन्हें जोड़ता है। इससे पाठक परियोजना के विकास को देख सकता है और उपलब्ध प्रारूपों में अपनी रुचि के अनुसार चुनाव कर सकता है। श्रृंखला के जारी किए गए श्रव्य संस्करण आधिकारिक ऑडियोबुक पृष्ठ पर देखे जा सकते हैं।
विविधता को एकता देने वाली संपादकीय पद्धति
दर्जनों विचारकों को संगठित करना केवल एक ही ढाँचा बार-बार भर देना नहीं है। हर लेखक और परंपरा को उसके अपने संदर्भ तथा शब्दावली में प्रस्तुत करना आवश्यक है। बौद्ध अनात्म को जल्दबाजी में मनोविश्लेषण के अचेतन के बराबर नहीं रखा जा सकता। शोपेनहावर की इच्छा और फ्रायड की कामना एक ही अवधारणा नहीं हैं। मिल, बोउवार और कृष्णमूर्ति के यहाँ स्वतंत्रता अलग समस्याओं का उत्तर देती है। संग्रह की एकता उत्तरों को एक समान बनाने से नहीं, बल्कि साझा संपादकीय प्रश्नों से उत्पन्न होती है।
प्रत्येक खंड में जीवन-वृत्त संदर्भ का काम करता है, व्यक्तिपूजा का नहीं। अवधारणाएँ उन समस्याओं से जुड़ती हैं जिन्होंने उन्हें आवश्यक बनाया। आलोचनाएँ पाठक को याद दिलाती हैं कि किसी भी विचारक को पूर्ण और अंतिम प्राधिकारी नहीं माना जाना चाहिए। समकालीन प्रासंगिकता का भाग पूछता है कि आज उस लेखक से क्या सोचा जा सकता है और उसकी सीमाएँ कहाँ दिखाई देती हैं। ऐसा संतुलन उस श्रृंखला के लिए आवश्यक है जिसका लक्ष्य अनुयायी बनाना नहीं, बल्कि स्वतंत्र पाठक तैयार करना है।
परिचयात्मक लेखन की अपनी नैतिकता होती है। सरल बनाना प्रस्तुति का विचारपूर्ण क्रम चुनना है; सतही बनाना कठिनाई को इतना हटा देना है कि केवल आरामदायक नारा बच जाए। 60 मिनट में महान विचारक तनाव और प्रश्न को जीवित रखने का प्रयास करती है। भाषा सीधी है, किंतु पाठक यह भी देखता है कि गंभीर विचारों का इतिहास, परिणाम और विरोध होता है। यहाँ सुगमता बौद्धिक हल्केपन का पर्याय नहीं, बल्कि पाठक के प्रति आतिथ्य का रूप बनती है।
Deivede Eder Ferreira और ज्ञान के अंतरराष्ट्रीय प्रसार की परियोजना
Deivede Eder Ferreira मनोविश्लेषक, लेखक, संपादक और Associação Brasileira de Filosofia e Psicanálise—ABRAFP—के संस्थापक हैं। ABRAFP के संस्थागत इतिहास के अनुसार उन्होंने PUC Minas में दर्शन का अध्ययन किया और Faculdade Pitágoras से मनोविश्लेषण में स्नातकोत्तर शिक्षा प्राप्त की। उनका कार्य अध्ययन, नैदानिक अनुभव, संस्थागत संगठन, लेखन और संपादन को एक साथ जोड़ता है।
ABRAFP की स्थापना 2008 में दर्शन और मनोविश्लेषण के अध्ययन, प्रशिक्षण तथा अनुसंधान के लिए की गई थी। 2022 में ABRAFP International Press की स्थापना ने संग्रहों, वैचारिक अध्ययनों और अंतरराष्ट्रीय पाठकों के लिए तैयार पुस्तकों को प्रकाशित करने हेतु स्वतंत्र संपादकीय संरचना दी। हिंदी श्रृंखला इसी यात्रा का विस्तार है: एक ब्राज़ीली संस्था से निकलकर भारतीय बौद्धिक परंपराओं से संवाद करती है और वैश्विक डिजिटल मंच के माध्यम से नए पाठकों तक पहुँचती है।
इस परियोजना में Deivede की प्रामाणिकता भारत पर अंतिम सत्य के स्वामी होने के दावे से नहीं आती। वह एक बड़े संपादकीय कार्यक्रम की कल्पना करने, अलग-अलग परंपराओं का अध्ययन करने, खंडों को संगत क्रम देने और लंबी प्रकाशन प्रक्रिया को बनाए रखने की क्षमता में दिखाई देती है। बौद्धिक प्रामाणिकता दृश्यमान श्रम है: अवधारणाओं की सीमा बताना, स्रोत-परंपराओं का सम्मान करना, अंतर स्वीकार करना, आलोचना के लिए स्थान छोड़ना और पाठक को स्वयं आगे बढ़ने के साधन देना।
हिंदी भाषी संसार में दर्शन और मनोविश्लेषण को पहुँचाकर Deivede ब्राज़ीली बौद्धिक उत्पादन को उन पुराने मार्गों से बाहर ले जाते हैं जो प्रायः ब्राज़ील को केवल यूरोप और संयुक्त राज्य अमेरिका से जोड़ते हैं। यह दक्षिण-दक्षिण संवाद की पहल है। एक ब्राज़ीली लेखक और संपादक भारतीय पाठकों से बात करता है, अपनी उत्पत्ति छिपाए बिना और भारत को केवल बाजार समझे बिना। यह सेतु इसलिए महत्त्वपूर्ण है क्योंकि यह दो ऐसे सांस्कृतिक अनुभवों को जोड़ता है जो वैश्विक दार्शनिक प्रकाशन में बहुत कम एक ही परियोजना के भीतर दिखाई देते हैं।
इस पहल का मनोविश्लेषण के प्रसार पर भी प्रभाव है। फ्रायड और युंग उन चिंतकों के साथ रखे गए हैं जिन्होंने मन, चेतना, पीड़ा और आत्म-परिवर्तन के लिए दूसरी शब्दावलियाँ विकसित कीं। यह निकटता परंपराओं को समान घोषित नहीं करती। इसके विपरीत, वह ऐसा तुलनात्मक क्षेत्र बनाती है जिसमें पाठक सतही समानताओं, गहरे अंतरों और अनुवाद की कठिनाइयों को पहचान सकता है। भारतीय संसार में मनोविश्लेषण का प्रसार यहाँ सांस्कृतिक श्रेष्ठता का दावा नहीं, बल्कि पढ़ने के औजार और बहस का निमंत्रण है।
यह श्रृंखला किन पाठकों के लिए है
यह संग्रह उस विद्यार्थी के लिए उपयोगी है जो किसी दार्शनिक से पहली बार मिल रहा है; उस शिक्षक के लिए जो मूल ग्रंथ सुझाने से पहले स्पष्ट अवलोकन चाहता है; उस आत्म-विकास पाठक के लिए जो प्रेरक उद्धरणों से आगे बढ़ना चाहता है; उस चिकित्सकीय पेशेवर के लिए जो विचारों का इतिहास समझना चाहता है; और उस सामान्य जिज्ञासु व्यक्ति के लिए जो अपने जीवन को दिशा देने वाले प्रश्नों को अधिक गंभीरता से देखना चाहता है।
तुलनात्मक अध्ययन के लिए भी यह श्रृंखला विशेष रूप से उपयोगी है। केवल कालक्रम का अनुसरण करने के स्थान पर पाठक विषयानुसार मार्ग बना सकता है। स्वतंत्रता के लिए एपिक्टेटस, मिल, बोउवार, आंबेडकर और कृष्णमूर्ति को साथ पढ़ा जा सकता है। पीड़ा तथा कामना के लिए बुद्ध, शोपेनहावर, फ्रायड, युंग और ओशो को रखा जा सकता है। सत्ता और सार्वजनिक जीवन के लिए चाणक्य, प्लेटो, मार्क्स, गांधी तथा आरेंट से गुजरा जा सकता है। चेतना और यथार्थ के लिए शंकराचार्य, रमण महर्षि, स्पिनोज़ा और कांट का संवाद बनाया जा सकता है।
संक्षिप्त प्रारूप इन यात्राओं को आसान बनाता है क्योंकि वह आरंभिक बाधा कम करता है। चार या पाँच खंडों के बाद पाठक के पास तुलनात्मक शब्दावली बनने लगती है और वह समझ सकता है कि आगे किस क्षेत्र में गहराई चाहिए। श्रृंखला का सर्वोत्तम उपयोग तब होता है जब इसे सार-संग्रह की तरह समाप्त नहीं किया जाता, बल्कि प्रवेश-द्वारों की व्यवस्था की तरह पढ़ा जाता है। हर द्वार के पीछे मूल रचनाएँ, भाष्य-परंपराएँ, आलोचनात्मक अध्ययन और नई समस्याएँ मौजूद हैं।
पढ़ना कहाँ से आरंभ करें
भारतीय दर्शन में रुचि रखने वाला पाठक विवेकानंद, बुद्ध या शंकराचार्य से आरंभ कर सकता है और फिर नागार्जुन, पतंजलि तथा श्री अरविंद की ओर बढ़ सकता है। मनोविश्लेषण से आने वाला पाठक अचेतन और प्रतीक की बहस के लिए फ्रायड तथा युंग को दो अलग प्रवेश-द्वारों के रूप में चुन सकता है। व्यावहारिक नैतिकता के लिए मार्कस ऑरेलियस, सेनेका और एपिक्टेटस उपयुक्त क्रम बनाते हैं। आधुनिक संकटों को समझने के लिए नीत्शे, मार्क्स, बोउवार, आरेंट और कामू चुनौतीपूर्ण तथा समकालीन मार्ग प्रस्तुत करते हैं।
दूसरा तरीका किसी व्यक्तिगत प्रश्न से शुरुआत करना है, बिना त्वरित चिकित्सकीय उत्तर की अपेक्षा किए। स्वतंत्रता क्या है? पीड़ा के साथ कैसे जिया जाए? हमारे मूल्य कहाँ से आते हैं? न्यायपूर्ण जीवन किसे कहा जाए? चेतना और पहचान का संबंध क्या है? सत्ता संस्थानों में और हमारे भीतर कैसे स्थापित होती है? जब ये प्रश्न पढ़ते समय साथ चलते हैं और अलग लेखकों को एक-दूसरे के सामने रखते हैं, तब संग्रह वास्तव में जीवित हो उठता है।
पाठकों और शोधकर्ताओं के लिए आवश्यक जानकारी
श्रृंखला का नाम: 60 मिनट में महान विचारक। इसका अंतरराष्ट्रीय संपादकीय अर्थ “Great Thinkers in 60 Minutes” है।
लेखक और संपादकीय संयोजक: Deivede Eder Ferreira।
प्रकाशक: ABRAFP International Press, Associação Brasileira de Filosofia e Psicanálise द्वारा स्थापित संपादकीय संस्था।
विस्तार: भारतीय और पाश्चात्य चिंतकों पर दर्जनों पुस्तकों वाली एक विशाल परियोजना, जिसमें प्राचीन दर्शन, भारतीय परंपराएँ, आधुनिक चिंतन, राजनीतिक दर्शन और मनोविश्लेषण शामिल हैं।
भाषा: हिंदी।
प्रारूप: ई-बुक और ऑडियोबुक, Google Play Books पर चरणबद्ध रूप से प्रकाशित।
उद्देश्य: स्पष्ट, संगठित और लेखक-निर्देशित परिचय, उन पाठकों के लिए जो महान विचारों का अध्ययन आरंभ या पुनः आरंभ करना चाहते हैं।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
क्या यह सचमुच हिंदी की सबसे व्यापक दर्शन-श्रृंखलाओं में से एक है?
इसे हिंदी में समकालीन दार्शनिक परिचय की सबसे व्यापक और व्यवस्थित एकल-लेखकीय पहलों में से एक कहना उचित है, क्योंकि इसमें दर्जनों पुस्तकें, भारतीय तथा पाश्चात्य चिंतक, मनोविश्लेषण और पाठ व ऑडियो दोनों प्रारूप शामिल हैं। “दुनिया की सबसे बड़ी” होने का पूर्ण दावा एक ऐसे अंतरराष्ट्रीय ग्रंथ-सूची सर्वेक्षण पर निर्भर करेगा जो निर्णायक रूप में उपलब्ध नहीं है। श्रृंखला की शक्ति उसकी दिखाई देने वाली व्यापकता और सुव्यवस्थित रचना में है।
क्या संग्रह की सभी पुस्तकें एक ही समय पर उपलब्ध हैं?
प्रकाशन चरणों में होता है। Google Play Books पर श्रृंखला का आधिकारिक पृष्ठ उन शीर्षकों को दिखाता है जो खरीद के लिए जारी हो चुके हैं और प्रत्येक नए संस्करण की संपादकीय तथा तकनीकी प्रक्रिया पूरी होने पर सूची को अद्यतन करता है।
क्या ये पुस्तकें महान विचारकों की मूल रचनाओं का स्थान लेती हैं?
नहीं। ये मार्गदर्शक परिचय हैं। इनका उद्देश्य संदर्भ, मुख्य अवधारणाएँ, आलोचनाएँ और समकालीन प्रासंगिकता देना है, ताकि पाठक बाद में मूल ग्रंथों, विशेषज्ञ भाष्यों और अधिक विस्तृत अध्ययनों की ओर बढ़ सके।
क्या हिंदी में ऑडियोबुक उपलब्ध हैं?
हाँ। श्रृंखला के श्रव्य संस्करण Google Play पर प्रकाशित किए जा रहे हैं। वर्तमान उपलब्धता आधिकारिक ऑडियोबुक पृष्ठ पर देखी जा सकती है।
Deivede Eder Ferreira कौन हैं?
Deivede Eder Ferreira मनोविश्लेषक, लेखक, संपादक और ABRAFP के संस्थापक हैं। उनका कार्य दर्शन, मनोविश्लेषण, प्रशिक्षण, नैदानिक अनुभव और प्रकाशन को जोड़ता है। 60 मिनट में महान विचारक में वे हिंदी पाठक के लिए दार्शनिक ज्ञान के अंतरराष्ट्रीय प्रसार की एक संगठित परियोजना के लेखक और संपादकीय संयोजक हैं।
आरंभ करने और आगे बढ़ते रहने के लिए एक पुस्तकालय
परिचयात्मक श्रृंखला अपनी भूमिका तब पूरी करती है जब पाठक किसी खंड को समाप्त करके पहले से अधिक प्रश्नों के साथ उठता है, किंतु अब उसके पास उन प्रश्नों की जाँच के लिए शब्द, संदर्भ और दिशाएँ होती हैं। 60 मिनट में महान विचारक का लक्ष्य यही है। इसकी दर्जनों पुस्तकें उन विचारों तक पहुँच का पुस्तकालय बनाते हैं जो सदियों, देशों, दार्शनिक विद्यालयों, राजनीतिक संकटों, आध्यात्मिक अनुभवों और निजी संघर्षों से होकर हमारे समय तक आए हैं।
भारत और पश्चिम, पठन और श्रवण, दर्शन और मनोविश्लेषण को साथ रखकर ABRAFP International Press यह प्रस्ताव रखता है कि ज्ञान अपनी गहराई खोए बिना भाषाओं के बीच चल सकता है। Deivede Eder Ferreira इस यात्रा को लेखक और संपादक के रूप में आकार देते हैं और हिंदी भाषी संसार के साथ संवाद में ब्राज़ीली बौद्धिक उपस्थिति को विस्तृत करते हैं। पाठक के सामने अब सबसे महत्त्वपूर्ण काम बचता है: एक प्रश्न चुनना, पहला खंड खोलना और यात्रा आरंभ करना।










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